Tuesday, March 3, 2020

national-health-policy-2017

Q.भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के ख़राब स्थिति के क्या कारण हैं ?और इसमें सुधार के लिए सरकार के द्वारा कौन से कदम उठाए गए हैं ?चर्चा करें.
प्रस्तावना
    किसी देश की जनता के स्वास्थ्य का संबंध उस देश के विकास से होता है। विकास यानी आर्थिक प्रगति। जब जनता स्वस्थ्य होगी तो उत्पादकता बढ़ेगी। उत्पादकता बढ़ेगी तो आर्थिक विकास दर बढ़ेगी और स्पष्टतः देश प्रगति करेगा।हमारा देश कुछ उन देशों में से एक है, जहाँ संक्रामक व असंक्रामक रोगों की भरमार है। इन सबके लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त सुविधा का होना अत्यंत आवश्यक है।
    संविधान ने भी अपने भाग 4 में राज्य सरकारों को नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत जनता के स्वास्थ्य के सुधार के लिए उचित पोषण एवं जीवन स्तर के विकास की जिम्मेदारी दी है। परन्तु हमारे विशाल जनसंख्या को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
स्वास्थ्य सुविधा की उपलब्धता में कमी के कारण
  • स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में ही बहुत कमी है। जनसंख्या के अनुपात में अस्पतालों की संख्या, स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं चिकित्सकों की बहुत कमी है। एक रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत चिकित्सक एवं 75 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्र भी मिलकर केवल 28 प्रतिशत जनसंख्या का ही इलाज कर पाते हैं। सरकार का अधिक ध्यान बीमारियों को रोकने के लिए स्वच्छता एवं पर्यावरणीय प्रदूषण पर रहता है। निश्चित रूप से यह सराहनीय है, परंतु जनता की मांग के अनुरूप पूर्ति नहीं हो पा रही है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं का बजट बहुत कम है। भारत में विश्व की 17 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। इस अनुपात में स्वास्थ्य सेवाओं पर सिर्फ 1 प्रतिशत खर्च किया जाता है। हमारे कुल जीडीपी का मात्र 1 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। विश्व में यह शायद न्यूनतम है। यह राशि भी राज्यों को समय पर नहीं दी जाती है। अगर दी भी जाती है, तो आगे उसका वितरण किस प्रकार और किस भ्रष्टाचारी तरीके से होता है, इसे सब जानते हैं। मानव संसाधन के अभाव में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की क्षमता को बढ़ाने के लिए दी गई धनराशि भी व्यर्थ ही जाती है।
  • असंख्य कानून एवं नियमों के चलते इस क्षेत्र में प्रशासकीय ढीलापन भी देखने में आता है। इन कानूनों के कारण सरकारी स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों, चिकित्सा उपकरणों, दवाई कंपनियों एवं अस्पतालों का अभाव है। ऐसे कानूनों से ऊपर उठकर ही पूरी जनता को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं देने के बारे में सोचा जा सकता है। निजी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में निहित भ्रष्टाचार भी इस क्षेत्र के लिए बहुत बड़ी बाधा है।
  • बीमारियों की सही समय पर पहचान और उनके प्रति जागरुकता की कमी के कारण समस्या कठिन होती जा रही है। पोलियो के उन्मूलन के लिए सरकार ने जिस तेजी और कड़ाई से अपना अभियान चलाया, उसने आखिर जीत दिला ही दी। श्रीलंका सरकार की मलेरिया उन्मूलन में दिखाई तत्परता से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हमारे कमजोर वर्ग की जनता को बीमारियों से बचाने के लिए एक उच्च भावना के साथ काम करने की आवश्यकता है। बीमारियों के बदलते पैटर्न और एंटीबॉयटिक के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता को देखते हुए इन पर पहल करने की जरूरत है।
स्वास्थ्य सुविधा में सुधार के लिए सरकार के द्वारा उठाए गए कदम
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017
  • इसका उद्देश्य निवारक एवं प्रोत्साहक स्वास्थ्य देखभाल दिशा-निर्देशों के माध्यम से सभी लोगों के लिये स्वास्थ्य और कल्याण का उच्चतम संभव स्तर सुनिश्चित करना है।
  • यह नीति किसी को भी वित्तीय कठिनाई का सामना किये बिना बेहतरीन गुणवत्तापरक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने की बात करती है।
  • वर्तमान में जन स्वास्थ्य व्यय जीडीपी का 1.04 प्रतिशत है। इसे समयबद्ध ढंग से 2.5% तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है।
  • 2020 तक राज्यों के स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यय को 8% से ज़्यादा करना है।
  • जन्म के समय जीवन प्रत्याशा को 67.5 वर्ष से बढ़ाकर वर्ष 2025 तक 70 वर्ष करने की बात भी इस नीति में कही गई है।
  • देश के 29 राज्यों व 7 केंद्रशासित प्रदेशों में 400 मेडिकल कॉलेज हैं लेकिन इन सभी की स्वास्थ्य सुविधाओं में फर्क है। इसी प्रकार इन राज्यों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्वास्थ्य सुविधाओं में भी व्यापक अंतर है। गुजरात, तमिलनाडु तथा आंध्रप्रदेश(आरोग्य श्री) इस मामले में काफी अच्छे हैं। अतः नई स्वास्थ्य नीति में सभी राज्यों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को उत्कृष्ट बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • इसमें पीपीपी मॉडल पर काम होगा। ज़िला अस्पताल और इससे ऊपर के अस्पतालों को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से अलग रखा जाएगा और इसे सार्वजनिक-निजी सहभागिता के तहत विकसित किया जाएगा।
  • नीति में गैर-संचारी रोगों की उभरती चुनौतियों से निपटने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • नीति में आयुष प्रणाली के त्रि-आयामी एकीकरण की परिकल्पना की गई है, जिसमें क्रॉस रेफरल, सह-स्थल और औषधियों की एकीकृत पद्धतियाँ शामिल हैं।
  • इसके अलावा, नीति में औषधियों और उपकरणों का सुलभता से विनिर्माण करने, मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करने तथा चिकित्सा शिक्षा में सुधार करने की अपेक्षा की गई है।
निष्कर्ष
जाने-माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमत्र्य सेन भी लगातार जोर देते रहे हैं कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किसी एकीकृत एक्शन प्लान की सख्त आवश्यकता है। उनका मानना है कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी उतनी ही आवश्यक है। और भारत को भी अपने नागरिकों को विश्व की स्पर्धा में आगे लाने के लिए उन्हें स्वास्थ्य-उपहार देना होगा।

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डिजिटल इंडिया
‘डिजिटल इंडिया’ भारत सरकार की एक नई पहल है जिसका उद्देश्य भारत को डिजिटल लिहाज से सशक्तक समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था में तब्दीपल करना है। इसके तहत जिस लक्ष्य को पाने पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है, वह है भारतीय प्रतिभा (आईटी) + सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) = कल का भारत (आईटी) |
‘डिजिटल इंडिया’ का विज़न तीन प्रमुख क्षेत्रों पर केन्द्रित है। ये हैं– हर नागरिक के लिए उपयोगिता के तौर पर डिजिटल ढांचा, मांग पर संचालन एवं सेवाएं और नागरिकों का डिजिटल सशक्तिेकरण।
कार्यक्रम की उपयोगिता
हर नागरिक के लिए उपयोगिता के तौर पर डिजिटल ढांचे में ये उपलब्धि हैं- नागरिकों को सेवाएं मुहैया कराने के लिए एक प्रमुख उपयोग के रूप में हाई स्पीिड इंटरनेट, डिजिटल पहचान अंकित करने का ऐसा उद्गमस्थल जो अनोखा, ऑनलाइन और हर नागरिक के लिए प्रमाणित करने योग्य हो, मोबाइल फोन व बैंक खाते की ऐसी सुविधा जिससे डिजिटल व वित्तीनय मामलों में नागरिकों की भागीदारी हो सके, साझा सेवा केन्द्र तक आसान पहुंच, पब्लिक क्लाउड पर साझा करने योग्य निजी स्थान और सुरक्षित साइबर-स्पे‍स।
सभी विभागों और न्यायालयों में मांग पर समेकित सेवाओं समेत शासन और सेवाओं, ऑनलाइन और मोबाइल प्लेटफॉर्म पर सही समय पर सेवाओं की उपलब्धता, सभी नागरिकों को क्लाउड एप पर उपलब्ध रहने का अधिकार हो। डिजिटल तब्दील सेवाएं के जरिये व्यवसाय में सहजता करने, इलेक्ट्रॉनिक और नकदी रहित वित्तीय लेन-देन करने, निर्णय सहायता सिस्टम और विकास के लिए जीआईएस का फायदा उठाना।
नागरिकों को डिजिटल सशक्त बनाने के साथ में सार्वभौमिक डिजिटल साक्षरता, सर्वत्र सुगम डिजिटल संसाधनों, डिजिटल संसाधनों/सेवाओं की भारतीय भाषाओं में उपलब्धता, सुशासन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्मों और पोर्टबिलिटी के सभी अधिकारों को क्लाउड के जरिये सहयोगपूर्ण बनाना। नागरिकों को शासकीय दस्तावेजों या प्रमाण-पत्रों आदि को उनकी मौजूदगी के बिना भी भरा जा सकेगा।
कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के 9 प्रमुख उद्देश्य हैं—-
ब्रॉडबैंड हाइवेज:
सामान्य तौर पर ब्रॉडबैंड का मतलब दूरसंचार से है, जिसमें सूचना के संचार के लिए आवृत्तियों (फ्रीक्वेंसीज) के व्यापक बैंड उपलब्ध होते हैं। इस कारण सूचना को कई गुणा तक बढ़ाया जा सकता है और जुड़े हुए तमाम बैंड की विभिन्न फ्रीक्वेंसीज या चैनलों के माध्यम से भेजा जा सकता है। इसके माध्यम से एक निर्दिष्ट समयसीमा में वृहत्तर सूचनाओं को प्रेषित किया जा सकता है। ठीक उसी तरह से जैसे किसी हाइवे पर एक से ज्यादा लेन होने से उतने ही समय में ज्यादा गाड़ियां आवाजाही कर सकती हैं। ब्रॉडबैंड हाइवे निर्माण से अगले तीन सालों के भीतर देशभर के ढाई लाख पंचायतों को इससे जोड़ा जायेगा और लोगों को सार्वजनिक सेवाएं मुहैया करायी जायेंगी।
मोबाइल कनेक्टिविटी:
देशभर में तकरीबन सवा अरब की आबादी में मोबाइल फोन कनेक्शन की संख्या जून, 2014 तक करीब 80 करोड़ थी। शहरी इलाकों तक भले ही मोबाइल फोन पूरी तरह से सुलभ हो गया हो, लेकिन देश के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में अभी भी इसकी सुविधा मुहैया नहीं हो पायी है। हालांकि, बाजार में निजी कंपनियों के कारण इसकी सुविधा में पिछले एक दशक में काफी बढ़ोतरी हुई है। देश के 55,000 गांवों में अगले पांच वर्षो के भीतर मोबाइल संपर्क की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए 20,000 करोड़ के यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (यूएसओएफ) का गठन किया गया है। इससे ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग के इस्तेमाल में आसानी होगी।
पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम:
भविष्य में सभी सरकारी विभागों तक आम आदमी की पहुंच बढ़ायी जायेगी। पोस्ट ऑफिस के लिए यह दीर्घावधि विजन वाला कार्यक्रम हो सकता है। इस प्रोग्राम के तहत पोस्ट ऑफिस को मल्टी-सर्विस सेंटर के रूप में बनाया जायेगा। नागरिकों तक सेवाएं मुहैया कराने के लिए यहां अनेक तरह की गतिविधियों को अंजाम दिया जायेगा।
ई-गवर्नेस:
प्रौद्योगिकी के जरिये सरकार को सुधारना: सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए बिजनेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग के ट्रांजेक्शंस में सुधार किया जायेगा। विभिन्न विभागों के बीच आपसी सहयोग और आवेदनों को ऑनलाइन ट्रैक किया जायेगा। इसके अलावा, स्कूल प्रमाण पत्रों, वोटर आइडी कार्डस आदि की जहां जरूरत पड़े, वहां इसका ऑनलाइन इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कार्यक्रम सेवाओं और मंचों के एकीकरण- यूआइडीएआइ (आधार), पेमेंट गेटवे (बिलों के भुगतान) आदि में मददगार साबित होगा। साथ ही सभी प्रकार के डाटाबेस और सूचनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मुहैया कराया जायेगा।
ई-क्रांति-
सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी: इसमें अनेक बिंदुओं को फोकस किया गया है। इ-एजुकेशन के तहत सभी स्कूलों को ब्रॉडबैंड से जोड़ने, सभी स्कूलों (ढाई लाख) को मुफ्त वाइ-फाइ की सुविधा मुहैया कराने और डिजिटल लिटरेसी कार्यक्रम की योजना है। किसानों के लिए रीयल टाइम कीमत की सूचना, नकदी, कजर्, राहत भुगतान, मोबाइल बैंकिंग आदि की ऑनलाइन सेवा प्रदान करना। स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऑनलाइन मेडिकल सलाह, रिकॉर्ड और संबंधित दवाओं की आपूर्ति समेत मरीजों की सूचना से जुड़े एक्सचेंज की स्थापना करते हुए लोगों को इ-हेल्थकेयर की सुविधा देना। न्याय के क्षेत्र में इ-कोर्ट, इ-पुलिस, इ-जेल, इ-प्रोसिक्यूशन की सुविधा। वित्तीय इंतजाम के तहत मोबाइल बैंकिंग, माइक्रो-एटीएम प्रोग्राम।
सभी के लिए जानकारी:
इस कार्यक्रम के तहत सूचना और दस्तावेजों तक ऑनलाइन पहुंच कायम की जायेगी। इसके लिए ओपेन डाटा प्लेटफॉर्म मुहैया कराया जायेगा, जिसके माध्यम से नागरिक सूचना तक आसानी से पहुंच सकेंगे। नागरिकों तक सूचनाएं मुहैया कराने के लिए सरकार सोशल मीडिया और वेब आधारित मंचों पर सक्रिय रहेगी। साथ ही, नागरिकों और सरकार के बीच दोतरफा संवाद की व्यवस्था कायम की जायेगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में आत्मनिर्भरता:
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़ी तमाम चीजों का निर्माण देश में ही किया जायेगा। इसके तहत ‘नेट जीरो इंपोर्ट्स’ का लक्ष्य रखा गया है ताकि 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। इसके लिए आर्थिक नीतियों में संबंधित बदलाव भी किये जायेंगे। फैब-लेस डिजाइन, सेट टॉप बॉक्स, वीसेट, मोबाइल, उपभोक्ता और मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्ट एनर्जी मीटर्स, स्मार्ट कार्डस, माइक्रो-एटीएम आदि को बढ़ावा दिया जायेगा।
रोजगारपरक सूचना प्रौद्योगिकी:
देशभर में सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार से रोजगार के अधिकांश प्रारूपों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसलिए इस प्रौद्योगिकी के अनुरूप कार्यबल तैयार करने को प्राथमिकता दी जायेगी। कौशल विकास के मौजूदा कार्यक्रमों को इस प्रौद्योगिकी से जोड़ा जायेगा। संचार सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनियां ग्रामीण कार्यबल को उनकी अपनी जरूरतों के मुताबिक प्रशिक्षित करेगी। गांवों व छोटे शहरों में लोगों को आइटी से जुड़े जॉब्स के लिए प्रशिक्षित किया जायेगा। आइटी सेवाओं से जुड़े कारोबार के लिए लोगों को प्रशिक्षित किया जायेगा। इसके लिए दूरसंचार विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम्स:
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को लागू करने के लिए पहले कुछ बुनियादी ढांचा बनाना होगा यानी इसकी पृष्ठभूमि तैयार करनी होगी।
राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन
देश के प्रत्येक राज्य/केन्द्र शासित प्रदेशों से चयनित ब्लाकों के प्रत्येक पात्रधारी परिवार के एक सदस्य का चुनाव करते हुए 10 लाख लोगों को सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) प्रशिक्षण प्रदान करने की परिकल्पना के साथ शुरु की गई है। 10 लाख में से 9 लाख लोगों को सरकारी प्रणाली के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाएगा और निगमित सामाजिक दायित्व के अंतर्गत उद्योग, गैर सरकारी संगठनों और अन्य के संसाधनों के माध्यम से शेष 1 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इसका उद्देश्य प्रशिक्षुओं की आवश्यकता के अनुसार प्रासंगिक बुनियादी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी कौशल उन्हें प्रदान करना है जिससे नागरिक सूचना प्रौद्योगिकी और संबंधित एप्लीकेशन का उपयोग करने में सक्षम हों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें और आगे उनकी आजीविका के अवसरों में वृद्धि हो। डिजिटल उपकरणों के उपयोग के माध्यम से लोग सूचना, ज्ञान और कौशल को हासिल करने में समर्थ होंगे।
डिजिटल साक्षरता की परिभाषा
डिजिटल साक्षरता व्यक्तिगत और समुदाय द्वारा डिजिटल तकनीक को समझना और जीवन की विभिन्न स्थितियों में उसका अर्थपूर्ण तरीके से इस्तेमाल करना है।
प्रशिक्षण स्तर
इस योजना के अंतर्गत दो स्तर के आईटी प्रशिक्षण में निम्न व्यापक उद्देश्यों को परिकल्पित किया गया है:
डिजिटल साक्षरता का मूल्यांकन (स्तर1)
एक व्यक्ति को सूचना एवं प्रौद्योगिकी में साक्षर बनाना जिससे वह मोबाइल फोन, टैबलेट आदि जैसे डिजिटल उपकरणों से ईमेल भेजने और प्राप्त करने एवं जानकारी इंटरनेट पर जानकारी को खोज सके।
डिजिटल साक्षरता की मूल बातें (स्तर2)
एक उच्च स्तर पर आईटी साक्षरता के साथ, नागरिक प्रभावी ढंग से सरकार एवं अन्य संगठनों द्वारा नागरिक को दी जा रही सेवाओं का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किये जाएंगे।
अगले लेख में हम डिजिटल लॉकर और डिजिटल भारत कार्यक्रम के बारे में चर्चा करेंगे

ब्रम्होस-मिसाइल

ब्रम्होस मिसाइल का सफल परीक्षण
सन्दर्भ
    रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) तथा रूस के वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से निर्मित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रम्होस का ओडिशा के चांदीपुर आइटीआर (एकीकृत परीक्षण रेंज) के एलसी (लांच कॉम्प्लेक्स)-3 से परीक्षण किया गया।
ब्रम्होस मिसाइल के बारे में
  • यह मिसाइल 8.4 मीटर लंबी है। इसका वजन तीन हजार किलोग्राम है।
  • यह 300 किलोग्राम तक विस्फोटक ढोने तथा 350 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता रखती है।
  • यह सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, आवाज की गति से भी 2.8 गुना तेज जाने में सक्षम है।
  • इस मिसाइल को पानी के जहाज, विमान, जमीन एवं मोबाइल लांचर से छोड़ा जा सकता है। इसे किसी भी दिशा में लक्ष्य की तरफ मनचाहे तरीके से छोड़ा जा सकता है।
  • यह हवा में मार्ग बदल सकती है और घनी शहरी आबादी में भी छोटे लक्ष्यों को सटीक रूप से भेदने में सक्षम है।
  • यह रडार की पकड़ में नहीं आती, इसको मार गिराना लगभग असंभव है।
पृष्ठभूमि
  • ब्रह्मोस एक कम दूरी की सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल है। इसे पनडुब्बी से, पानी के जहाज से, विमान से या जमीन से भी छोड़ा जा सकता है। यह कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरती है और इस तरह से रेडार की आंख से बच जाती है। ब्रह्मोस का पहल सफल लॉन्च 12 जून, 2001 को ओडिशा के चांदीपुर तट हुआ था। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मस्कवा नदी पर रखा गया है।
  • इस सफल परीक्षण के नतीजतन भारतीय सशस्त्र बलों के भंडार में रखी मिसाइलों की जगह दूसरी मिसाइलें लाने पर आने वाली लागत में भारी बचत होगी।
  • डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने कहा कि दो चरणों वाली मिसाइल को पहले ही थल सेना और नौसेना में शामिल किया जा चुका है। इसके साथ ही वायु सेना के संस्करण का भी सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। इन दो चरणों वाली मिसाइलों में पहली ठोस है जबकि दूसरी रैमजेट तरल प्रणोदक है। ब्रह्मोस के संस्करणों को भूमि, वायु, समुद्र और जल के अंदर से दागा जा सकता है।

निपाह-वायरस

सन्दर्भ
    दक्षिण भारत में निपाह वायरस तेजी से फ़ैल रहा है। केरल के कोझीकोड में इस निपाह वायरस से कई लोगों की मौत हो चुकी है।इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने इस संबंध में एक कमेटी गठित की है। जो बीमारी की स्थिति जाने एवं लोगों का बचाव करने की कोशिश में जुटी है। इसके साथ वायरस की जद में ज्यादा लोग न आ सके इसके लिए उपाय किए जा रहे हैं।
निपाह वायरस क्या है ?
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, निपाह वायरस (एनआईवी) तेज़ी से उभरता वायरस है, जो जानवरों और इंसानों में गंभीर बीमारी को जन्म देता है। एनआईवी के बारे में सबसे पहले 1998 में मलेशिया के निपाह गाँव से पता चला था। वहीं से इस वायरस को ये नाम मिला। उस वक़्त इस बीमारी के वाहक सूअर थे।
  • नए अध्ययन के अनुसार, निपाह वायरस चमगादड़ से फलों में और फलों से इंसानों और जानवरों में फैलता है। चमगादड़ और फ्लाइंग फॉक्स मुख्य रुप से निपाह और हेंड्रा वायरस के वाहक माने जाते हैं। यह वायरस चमगादड़ के मल, मूत्र और लार में पाया जाता है।
  • आरएनए या रिबोन्यूक्लिक एसिड वायरस परमिक्सोविरिडे परिवार का वायरस है, जो कि हेंड्रा वायरस से मेल खता है। ये वायरस निपाह के लिए जिम्मेदार होता है।
संक्रमण के लक्षण
    इस बीमारी में बुखार आता है और मांस पेशियों में दर्द रहता है। कई मामलों में दिमाग में सूजन भी आ जाती है। इसके चलते मरीज सुस्त रहता है, मानसिक रूप से अस्थिर हो जाता है। गंभीर मामलों में मरीज कोमा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।
निपाह वायरस के वाहक
    चमगादड़ इस वायरस का प्राकृतिक वाहक है। इनकी लार, मल – मूत्र से यह प्रकृति में फैलता है। इससे संक्रमित फलों और अन्य जानवरों के जरिए यह इंसानी शरीर में फैलता है। निपाह वायरस से संक्रमित किसी व्यक्ति से संपर्क में आने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
उपचार:
    निपाह वायरस का इलाज खोजा नहीं जा सका है। इसी वजह से मलेशिया में निपाह वायरस से संक्रमित करीब 50 फीसद लोगों की मौत हो गई। हालांकि प्राथमिक तौर पर इसका कुछ इलाज संभव है। हालांकि रोग से ग्रस्त लोगों का इलाज मात्र रोकथाम है। इस वायरस से बचने के लिए फलों, खासकर खजूर खाने से बचना चाहिए। पेड़ से गिरे फलों को नहीं खाना चाहिए। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है।
निपाह वायरस के दुनिया में मामले

blood-corpuscles

रक्त कणिकाएं Blood Corpuscles


रक्त कणिकाएं Blood Corpuscles
रक्त कणिकाएं (जिसे रक्त कणिका भी कहा जाता है) रक्त मे पायी जाने वाली कोई एक कणिका (कोशिका) है। स्तनधारियों में इन कोशिकाओं की मुख्यतः तीन श्रेणियां होती हैं:
  • लाल रक्त कणिकाएं (RBC),
  • श्वेत रक्त कणिकाएं (WBC) एवं
  • रक्त विम्बाणु या प्लेटलेट्स।
लाल रक्त कणिकाएं Red blood cells or Red Blood Corpuscles (RBCs), Erythrocytes
  • लाल रक्त कोशिकायें रूधिरवर्णिका (हीमोग्लोबिन) के माध्यम से ऑक्सीजन शरीर के विभिन्न अवयवों को पहुंचाती है।
  • लाल रक्त कोशिकाएं कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक पहुंचा कर उसे शरीर से निकालने का भी काम करती हैं।
  • लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण अस्थि मज्जा (bone marrow) में होता है। इनका जीवनकल 120 दिनों का होता है, इसके बाद वे नष्ट हो जाती हैं। आयरन युक्त भोजन लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होते हैं, विटामिन भी स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। विटामिन ई, विटामिन बी 2, बी 12, और बी 3 इन कोशिकाओं के निर्माण में सहायक हैं।
  • आहार में लोहे या विटामिन की कमी से कई लाल रक्त कोशिकाओं से सम्बंधित कई बिमारिय हो सकती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं से सम्बंधित कई बीमारियाँ आनुवांशिक हो सकती हैं।
  • लाल रक्त कोशिकाओं से सम्बंधित प्रमुख रोग एनीमिया है, जिसमे लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन सामान्य रूप से नहीं हो पाता है, जिससे शरीर को ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पाती है। एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाएं असामान्य आकार की हो जाती हैं। एनीमिया के प्रमुख लक्षणों में, थकान, अनियमित दिल की धड़कन, पीली त्वचा, ठंड लगना गंभीर मामलों में दिल की विफलता, आदि शामिल हैं।
  • लाल रक्त कोशिकाओं की कमी से पीड़ित बच्चों में अन्य बच्चों की तुलना में धीरे धीरे विकास होता है। ये लक्षण ये प्रदर्शित करते हैं, कि लाल रक्त कोशिकाएं हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हैं। कुछ सामान्य प्रकार के एनीमिया इस प्रकार होते हैं-
  • श्वेत रक्त कणिकाएं White blood cells (WBCs), Leukocytes or Leucocytes
    श्वेत रक्त कोशिकाएं हमारी रक्त प्रणाली के एक महत्वपूर्ण घटक हैं। यद्यपि यह हमारे शरीर की केवल 1% होती हैं परन्तु हमारे स्वास्थ्य पर इनका प्रभाव महत्वपूर्ण है। ल्यूकोसाइट्स या सफेद रक्त कोशिकायें, बीमारी और बीमारी के खिलाफ अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। 500 RBCs के बीच में एक WBC होती है।
    श्वेत रक्त कोशिकाएं का अस्थि मज्जा के अंदर ही उत्पादन होता है, और ये रक्त और लसीका ऊतकों (lymphatic tissues) में जमा रहती है। श्वेत रक्त कोशिकाओं का जीवन छोटा है, इसलिए इनका उत्पादन लगातार होता रहता है। ये दो प्रकार की होती हैं-
    • कणिकामय श्वेत रक्त कणिकाएं Granulocytes
    • कणिकारहित श्वेत रक्त कणिकाएं Agranulocytes
    कणिकामय श्वेत रक्त कणिकाएं Granulocytes
    ये तीन प्रकार की होती हैं-
    1- बेसोफिल्स Basophils- यह लगभग 5% होती हैं। ये संक्रमण के समय अलार्म का कम करती हैं। ये हिस्टामिन (histamine) नाम के एक रसायन का स्रावण करती हैं, जो एलर्जी रोगों का सूचक होता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करता है।
    2- इओसिनोफिल्स Eosinophils– 3% होती हैं। ये परजीवियों को मारने, कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने और एलर्जी प्रतिक्रियाओं के खिलाफ सहायता प्रदान करती हैं।
    3- न्यूट्रोफिल्स Neutrophils– लगभग 67% होती हैं। ये बैक्टीरिया और कवक आदि को मारकर पचाने का कम करती हैं। शरीर में इनकी संख्या सबसे ज्यादा होती है। संक्रमण हमलों की स्थिति में ये रक्षा की पहली पंक्ति में होती हैं।
    कणिकारहित श्वेत रक्त कणिकाएं Agranulocytes
    ये भी 3 प्रकार की होती हैं
    1- लिम्फोसाइट lymphocytes– ये लगभग 25% होती हैं। वे बैक्टीरिया, वायरस और अन्य संभावित हानिकारक संक्रमणों के खिलाफ की रक्षा के लिए एंटीबॉडी पैदा करती हैं।
    2- मोनोसाइट्स Monocytes– ये लगभग 1.5% तक होती हैं। ये मुख्यतः जीवाणुओं को नष्ट करती हैं।
    3- मेक्रोफेजेस Macrophages– लगभग 3% तक होती हैं।
    रक्त विम्बाणु या प्लेटलेट्स Platelets or Thrombocytes
  • प्लेटलेट्स आकर में प्लेट की तरह, छोटी रक्त कोशिकाए होती है, जो रक्तस्राव (bleeding) को रोकने के लिए रक्त का थक्का ज़माने में मदद करती हैं। साथ ही वे कुछ रसायनों का भी स्राव करती हैं जो अन्य प्लेटलेट्स को रक्तस्राव की जगह पर पहुँचाने के लिए संकेत देते हैं।
  • प्लेटलेट्स का निर्माण भी श्वेत और लाल रक्त कणिकाओं के साथ ही अस्थि मज्जा में होता है। इनका जीवन काल लगभग 10 दिनों का होता है। इनमे केन्द्रक नहीं पाया जाता है।
  • प्लेटलेट की संख्या अधिक और कम होने पर क्या होता है?
    असामान्य प्लेटलेट से निम्न चिकित्सीय प्रभाव हो सकते हैं-
    1- थ्रोम्बोसाइटोपेनिया Thrombocytopenia– इस स्थिति में अस्थि मज्जा में बहुत कम प्लेटलेट का निर्माण होता है, या किसी कारणवश ये नष्ट हो जाती हैं। इस कारन रक्तस्राव या आन्तरिक रक्तस्राव होता रहता है। थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कई दवाओं, कैंसर, गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था, संक्रमण, और एक असामान्य प्रतिरक्षा प्रणाली (abnormal immune system) आदि कई कारणों से हो सकता है।
    2- थ्रोम्बोसाइटोथीमिया Thrombocythemia– इस स्थिति में अस्थि मज्जा प्लेटलेट्स का ज्यादा निर्माण करने लगती है (1 माइक्रोलीटर में 10 लाख से ज्यादा)। जिसके कारन मस्तिष्क या दिल की रक्त की आपूर्ति में अवरोध उत्पन्न हो सकता है। थ्रोम्बोसाइटोथीमिया के कारन अभी अज्ञात हैं।
    3- थ्रोम्बोसाइटोसिस Thrombocytosis– यह स्थिति भी अधिक प्लेटलेट निर्माण के कारन ही उत्पन्न होती है, लेकिन इसका कारण असामान्य अस्थि मज्जा (abnormal bone marrow) द्वारा अधिक मात्रा में प्लेटलेट का निर्माण नहीं होता है। शरीर में बीमारी या अन्य किसी परिस्थितियों के कारण अस्थि मज्जा अधिक प्लेटलेट्स बनाने लगता है। थ्रोम्बोसाइटोसिस से पीड़ित एक तिहाई व्यक्ति कैंसर से पीड़ित होते हैं। अन्य कारणों में संक्रमण, सूजन, और दवाओं से होने वाली प्रतिक्रियायें शामिल हैं।

    disease-and-treatment

    • गठिया रोग शरीर के जोड़ों में यूरिक अम्ल के जमाव से होता है.
    • ड्रॉप्सी रोग सरसों के तेल में अर्जीमोन तेल के मिलावट ,सायनायड के मिलावट या उजला रंग करने वाली मिलावट के कारण होता है.
    • पार्थीनियम पौधे की पत्ती के निचोड़ का उपयोग नैनो कणों के जैव संश्लेषण में किया जाता है.यह कैंसर उपचार में लाभकारी है.
    • मलेरिया से प्रभावित होने वाला अंग प्लीहा (SPLEEN) है.
    • मलेरिया प्लाजमोडियम नामक एक कोशिकीय प्रोटोजोआ जंतु के कारण होता है.तथा इसकी वाहक मादा एनाफिलीज मच्छर होती है .
    • डेंगू एक बुखार है जो विषाणु के संक्रमण से होता है ,जिसे क्यूलेक्स फैटिगेंस तथा एडीज एजिप्टाइ नामक मच्छर फैलाते है .
    • डेंगू बुखार में पीड़ित रोगी के रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है.
    • पीला बुखार या पित्त ज्वर एक विषाणु जनित रोग है, जिसका संवहन एडीज इजिप्टि जाती के मच्छरों के द्वारा होता है.
    • एन्थोफिबिया एक बीमारी है जिसमे पुष्पों तथा पुष्पों के विभिन्न भाग से भय उत्पन्न होता है .
    • हाइड्रोफिबिया – पानी से डर .
    • मेनेंजाइटिस, वायरस, बैक्टेरिया तथा अन्य माइक्रोऑर्गेनिज्म के संक्रमण से मस्तिष्क तथा मेरु रज्जु पर चढ़ी झिल्ली में सूजन आ जाने से होने वाला रोग है.
    • हिस्टीरिया रोग सामान्यतः जवान अविवाहित महिलाओं में होता है.
    • सिलिकॉसिस एक फेफड़े सम्बंधित बीमारी है .
    • आयोडीन की कमी से घेंघा रोग होता है.
    • MRI – मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग
    • BMD परिक्षण ऑस्टियोपोरोसिस रोग की पहचान के लिए किया जाता है.ऑस्टियोपोरोसिस हड्डी का एक रोग है.
    • सैल्मोनेला बैसिलाई नामक जीवाणु के कारण भोजन विषाक्त होता है.
    • इताई इताई रोग, कैडमियम के दीर्घकालीन विषाक्तन से होता है.
    • डिप्थीरिया , कुकुर खांसी तथा टिटनेस से बचाव हेतु नवजात शिशु को DPT वैक्सीन दिया जाता है.
    • ब्लू बेबी सिंड्रोम रोग से बच्चे प्रभावित होते है जब जल में नाइट्रेट की मात्रा अधिक हो जाती है.

    • दिल का दौरा पड़ने के पहले घंटे को गोल्डन आवर के नाम से जाना जाता है.
    • पोटैशियम ह्रदय की धड़कन एवं नाड़ी के कार्यों को संचालित करता है.
    • लम्बे समय तक उपवास रखने का सर्वाधिक प्रभाव गुर्दे पर पड़ता है.
    • कोबाल्ट 60 – शरीर के अंतरंग के अबुर्द उपचार के लिए .
    • आयोडीन 131 – थायरॉइड अबुर्द का उपचार.
    • फास्फोरस – 32 श्वेतरक्तता का उपचार (ल्यूकीमिया)
    • गोल्ड 198 – कैंसर का उपचार
    • आर्सेनिक 74 – ट्यूमर की पहचान के लिए
    • हीमोफीलिया एक अनुवांशिक रोग है जिसमे ,रुधिर में कुछ प्रोटीन की कमी के कारण थक्का नहीं जमता.
    • एल्जाइमर रोग से मानव शरीर का प्रभावित होने वाला अंग मष्तिष्क है.
    • विकिरणों से सर्वाधिक प्रभावित आँख और सबसे कम प्रभावित मस्तिष्क होता है.
    • पोलियो का वायरस शरीर में दूषित भोजन तथा जल के द्वारा प्रवेश करता है .
    • पोलियो का कारण विषाणु है.
    • पोलियो की खोज जोन्स साल्क ने की.
    • एथलीट फूट नामक बीमारी ट्राइकोफाइकेन नामक विशेष फफूंदी द्वारा होता है.
    • हेपेटाइटिस बी वायरस हेपा डीएनए वायरस है जिसके कारण यकृत रोग होता है.
    • EBOLA एक ऐसा रोग है जो विषाणु से होता है.EBOLA एक ऐसा रोग है जो मरीज के संपर्क में आने से फैलता है.
    • एफ्लाटॉक्सिन खाद्य विषाक्तन के द्वारा सामान्यतः मनुष्य का यकृत प्रभावित होता है.
    • बर्ड फ्लू, एवियन इन्फ्लुएंजा नमक रोग का ही प्रचलित नाम है जो कि H5N1 नामक वायरस के द्वारा पैदा होता है.
    • किसी भी अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग में कैथ लैब होता है ,जिसके द्वारा ‘कोरोनरी धमनी रोग’ कि पहचान एवं उपचार के लिए विभिन्न परिक्षण किए जाते है.
    • एम्फासीमा , “क्रोनिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग” है जिससे मनुष्य का फेफड़ा प्रभावित होता है.
    • Cu -t का सर्वसामान्य दुष्प्रभाव रक्तस्त्राव है.
    • इंटरफेरॉन एक प्रकार का प्रोटीन है जिसका प्रयोग गुर्दे एवं रक्त कैंसर के उपचार के लिए किया जाता है.
    • थैलीसीमिया एक वंशानुगत बीमारी है, जिसमे रोगी के शरीर में हीमोग्लोबिन के संश्लेषण की क्षमता नहीं होती है.
    • कुष्ठ रोग जीवाणु के द्वारा उत्पन्न किया जाता है.
    • फुट एवं माउथ रोग, मुख्यतः गाय,भैंस ,बकरी तथा सुअर में पाया जाता है. यह रोग मुख्यतः विषाणु के द्वारा होता है .
    • ब्राइटस रोग को यूरेमिया भी कहते है तथा यह शरीर के गुर्दे को प्रभावित करता है.
    • BCG का टीका तपेदिक से बचाव के लिए शिशु को जन्म के तुरंत बाद लगाया जाता है.
    • दन्त क्षय का कारण बैक्टीरियल संक्रमण है.
    • चेचक, पॉक्स वायरस के द्वारा होता है जो एक संक्रामक रोग है.
    • पीलिया से मनुष्य का यकृत अंग दुष्प्रभावित होता है.
    • तम्बाकू एवं गुटखा के सेवन से ओरल सबम्युकस बीमारी होता है.
    • HIV वायरस से अत्यंत घातक रोग एड्स होता है.
    • AIDS के लिए उत्तरदायी विषाणु ,रेट्रो समूह का विषाणु है.
    • ELISA परीक्षण, AIDS की पहचान के लिए किया जाता है.

    health-light

    हमारा स्वास्थ्य और प्रकाश

    प्रस्तावना
    हम सभी चाहते हैं कि हम स्वस्थ रहें। स्वस्थ रहने के लिये उचित खान-पान, रहन-सहन और दैनिक जीवनचर्या का बड़ा योगदान होता है।आजकल असंतुलित या कहें कि बिगड़ती हुई जीवनशैली के कारण कई खतरनाक बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। हमारी जीवनशैली में और स्वस्थ रहने में सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक योगदान है।
    ब्रह्मांड में पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बहुत से अन्य कारणों के साथ-साथ प्रकाश भी एक प्रमुख कारण है। पृथ्वी पर प्रकाश का एक मुख्य स्रोत सूर्य है, जिसके बिना जीवन की उत्पत्ति की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। दरअसल, न केवल जीवन की उत्पत्ति के लिये सूर्य का प्रकाश आवश्यक है, बल्कि जीवन को बनाए रखने के लिये भी सूर्य का प्रकाश जरूरी है। सूर्य के प्रकाश की मदद से ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के द्वारा पेड़-पौधे अपना भोजन बनाते हैं और हमें जीवनदायनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। चूँकि पेड़-पौधों से ही हमें भोजन मिलता है इसलिये कह सकते हैं कि अपरोक्ष रूप से सूर्य का प्रकाश ही हमारे भोजन का उपाय करता है। यही नहीं, मनुष्यों और पशुओं की अनेक जैविक क्रियाओं को पूर्ण करने के लिये भी प्रकाश आवश्यक होता है।
    श्वेत प्रकाश जैसे कि सूर्य से प्राप्त प्रकाश विभिन्न सात रंगों से मिलकर बना होता है, जिनकी तरंगदैर्घ्य अलग-अलग होती है। तरंगदैर्घ्य् के बढ़ते क्रम में ये रंग हैं- बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, नीला, नारंगी तथा लाल। अलग-अलग तरंगदैर्घ्यस वाले प्रकाश का हमारे शरीर पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि विद्युत बल्ब जैसे प्रकाश स्रोतों से प्राप्त प्रकाश में ये सातो रंगों के प्रकाश नहीं होते हैं।
    शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं के संचालन के लिये प्रायः 290 नैनोमीटर से 770 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य वाला प्रकाश उपयोगी होता है। प्रकाश के संपर्क में आने से कभी-कभी कुछ लोगों की त्वचा लाल हो जाती है। दरअसल, यह 290 से 315 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्यस वाली पराबैंगनी प्रकाश किरणों के संपर्क में आने से होता है। इसी तरह यदि शरीर 280 से 400 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्यय वाले पराबैंगनी प्रकाश से प्रभावित होता है तो त्वचा काली हो सकती है और दाँतों में विकृति आ जाती है। दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 400 से 780 नैनोमीटर की रेंज में आती है।
    स्वास्थ्य के लिये प्रकाश की उपयोगिता
    प्रकाश हमारे स्वास्थ्य के लिये अत्यंत आवश्यक है। यदि हमारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में सूर्य का प्रकाश न मिले तो कई तरह की बीमारियाँ होने की संभावना बढ़ जाती है। आप जानते होंगे कि स्वस्थ रहने के लिये हमें विभिन्न पौष्टिक तत्व विटामिन, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण आदि की आवश्यकता होती है इसमें अधिकांश विटामिन और अन्य पौष्टिक पदार्थ हमें खाद्य पदार्थों से मिल जाते हैं, परंतु विटामिन-डी एक ऐसा विटामिन है जो कि मुख्यतः सूर्य के प्रकाश से ही मिलता है। जब सूर्य के प्रकाश की 290 से 300 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्ये वाली अल्ट्रावायलेट यानि पराबैंगनी किरणें हमारी त्वचा पर पड़ती हैं तो हमारी त्वचा में विटामिन-डी का निर्माण होता है। जब ये पराबैंगनी किरणें त्वचा के सम्पर्क में आती हैं तो हमारी त्वचा में मौजूद एक प्रो-हार्मोन विटामिन में परिवर्तित होने की रासायनिक अभिक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
    इस प्रक्रिया में हमारी त्वचा में मौजूद 7-डिहाइड्रो कोलेस्ट्रॉल सूर्य के प्रकाश से प्राप्त होने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों को अवशोषित कर, कोलीकेल्सिफेरोल में परिवर्तित हो जाता है, जोकि विटामिन डी3 का प्रीविटामिन रूप होता है। इसके बाद यह प्रीविटामिन हमारे शरीर में प्रवाहित हो रहे रक्त के माध्यम से यकृत में पहुँचता है, जहाँ इसका चयापचय (मेटाबोलिकरण) होकर यह हाइड्रोक्सी विटामिन-डी में परिवर्तन होता है। इसे 25 हाइड्रोक्सी विटामिन डी यानि 25-(ओएच) डी भी कहते हैं। आगे हमारे गुर्दे यानि किडनी इस 25-(ओएच) डी को डि-हाइड्रोक्सी विटामिन-डी में बदल देते हैं। यह विटामिन डी का हार्मोन रूप होता है, जिसे हमारा शरीर उपयोग में लाता है।
    माना जाता है कि हमारे शरीर को जितनी विटामिन-डी की आवश्यकता होती है उसका 90 प्रतिशत से अधिक सूर्य के प्रकाश में रहने से मिल जाता है अथवा मिल जाना चाहिए। इसके लिये हमारे शरीर का बिना ढका हुआ भाग जैसे चेहरा, पीठ, हाथ और पैर आदि प्रति दिन आधे घंटे के लगभग धूप में रहना आवश्यक होगा। यदि आप हर रोज धूप में नहीं रह सकते तो हफ्ते में दो-तीन दिन तो रहना ही चाहिए, अन्यथा शरीर में विटामिन-डी की कमी हो सकती है, जिसके कारण कई तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं। आदर्श स्थिति में यदि हम बिना शरीर ढके 30 मिनट धूप में रहें तो हमारा शरीर 10,000 आईयू से 20,000 आईयू तक विटामिन-डी पैदा कर सकता है।
    हमारे शरीर के लिये विटामिन-डी अत्यंत उपयोगी होता है। यह शरीर में कैल्सियम के अवशोषण में मदद करता है। हड्डियों की डेंसिटी यानि घनत्व को बढ़ाता है और उन्हें मजबूत बनाने में सहायक होता है। इससे शरीर में हड्डियों के विकास और मांसपेशियों की कार्य प्रणाली में भी मदद मिलती है, साथ ही यह हमारे रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत भी करता है तथा शरीर में इंसुलिन, कैल्सियम और फॉस्फोरस के स्तर को बनाए रखने में सहायक होता है। शोध अध्ययनों के आधार पर यह माना जाता है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन लगभग 2,000 आईयू विटामिन-डी चाहिए, लेकिन प्रायः देखा गया है कि हमारी बदलती दिनचर्या के कारण अधिकांश लोग हफ्तों तक धूप के संपर्क में नहीं आते हैं, जिसके कारण शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है। और कई प्रकार के रोग पैदा होने लगते हैं। इसलिये आवश्यक है कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सूर्य के प्रकाश का भरपूर उपयोग करना चाहिए।
    बच्चों में विटामिन-डी की कमी होने से उनके शरीर में कैल्सियम का समुचित उपयोग नहीं हो पाता है, जिसके कारण उनकी हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं और मुड़ जाती हैं जिसे रिकेट्स बीमारी कहते हैं।
    यदि बच्चों के शरीर पर 400 से 500 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य का प्रकाश न पड़े तो उनके शरीर में बिल्यूरमिन नामक पदार्थ की कमी हो जाती है, जिसके कारण उन्हें जांडिस यानि पीलिया हो जाता है। इसके अलावा भी प्रकाश का हमारे स्वास्थ्य पर कई प्रकार से प्रभाव हो सकता है। यह प्रभाव मानसिक भी हो सकता है और शारीरिक भी। उदाहरण के लिये आपने देखा होगा कि प्रायः दिन के समय विशेषकर प्रातःकाल जब सूर्य का प्रकाश हमारे शरीर पर और हमारे आस-पास बिखरता है तो हमारा मन प्रशन्नचित्त होता है, आत्मविश्वास अधिक होता है, शरीर फुर्तीला होता है, आँखों में दबाव कम होता है। दिन के प्रकाश का एक और प्रमुख मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि दिन के उजाले में हम एक दूसरे से मिलने और बाहर की खुली हवा में जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं। प्रकाश के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के अलावा हमारे शरीर में नियंत्रण और समन्वय बनाने वाले तंत्रिका तंत्र तथा हार्मोन क्रियाविधि भी प्रकाश द्वारा ही संचालित होते हैं।
    यही नहीं, हमारे नेत्र भी प्रकाश का उपयोग करके ही हमारे चारों ओर की वस्तुओं को देखने के लिये हमें समर्थ बनाते हैं। हमारी आँख की रेटिना में प्रकाश सुग्राही अनेक कोशिकाएं होती हैं, जो प्रकाश के संपर्क में आने पर सक्रिय हो जाती हैं तथा विद्युत सिग्नल उत्पन्न करती हैं। ये सिग्नल तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क तक पहुँच जाते हैं और इस तरह हमें वस्तुओं को देखने में मदद करते हैं।
    आप जानते हैं कि हमारे स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक भोजन आवश्यक होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे भोजन के मूल में भी प्रकाश ही है। यदि प्रकाश न होता तो पेड़-पौधे न होते, क्योंकि पेड़-पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से बनाते हैं जिसके लिये सूर्य का प्रकाश आवश्यक है। और पेड़-पौधे न होते तो हमें भोजन और ऑक्सीजन नहीं मिलती। तो है न प्रकाश का योगदान हमारे स्वस्थ रहने में।
    स्वास्थ्य पर प्रकाश का दुष्प्रहभाव
    ऐसा नहीं कि प्रकाश हमारे शरीर और स्वास्थ्य के लिये हमेशा उपयोगी ही हो। प्रकाश स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भी हो सकता है। जैसे कि आजकल बढ़ते प्रकाश प्रदूषण के कारण अनिद्रा जैसी बीमारियाँ हो रही हैं। सूर्य के प्रकाश में मौजूद अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में अधिक देर तक रहने से सनबर्न तथा त्वचा का कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं। गोरी त्वचा वाले लोगों की त्वचा काली पड़ सकती है। किसी भी प्रकार के तेज प्रकाश से हमारी आँखों को क्षति पहुँच सकती है।
    निष्कर्ष
    कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि प्रकाश का, विशेषकर सूर्य के प्रकाश का, हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव होता है। जहाँ एक ओर यह शरीर के लिये अति आवश्यक विटामिन-डी का एक मात्र प्राकृतिक स्रोत है, वहीं यह स्किन कैंसर और बढ़ते प्रकाश प्रदूषण का एक प्रमुख कारण भी है।